- खबर हटके

*फादर्स डे विशेष……पिता की ‘‘कलम’’ छूटी, तो बेटे ने ‘‘सेवा की किताब’’ थाम ली*

Spread the love

 

*वरिष्ठ पत्रकार स्व. मनोहरलाल कुमावत के साये के बाद उनके बड़े पुत्र शैलेन्द्र कुमावत ने आजीवन सेवा का व्रत लेकर पेश की अनोखी मिसाल*

*पिता की ‘विरासत’ सहेजने के लिए जिसने ठुकरा दिया करियर, आज के दौर में श्रवण कुमार बने उज्जैन के शैलेन्द्र कुमावत*

*’पिता वो मजबूत टहनी है, जिस पर पैर रखकर एक नन्हा बालक सुनहरे भविष्य के सपने बुनता है। मगर अफसोस, आज के आधुनिक युग की कड़वी सच्चाई यह भी है कि जब वही टहनी वक्त के साथ सूखने लगती है, तो कई संताने उसे बेकार समझकर काटने या फेंकने में देर नहीं लगातीं।*

*लेकिन इसी आधुनिक और भौतिकवादी दौर में, मध्य प्रदेश की पवित्र महाकाल नगरी उज्जैन के एक बेटे ने समाज के सामने पितृ-भक्ति की एक ऐसी अनूठी और अनुकरणीय मिसाल पेश की है, जिसे सुनकर हर पिता का मस्तक गर्व से ऊंचा हो जाए और हर संतान की आंखें नम। हम बात कर रहे हैं उज्जैन के वरिष्ठ पत्रकार स्व.मनोहरलाल कुमावत के बड़े पुत्र शैलेन्द्र कुमावत की।*

*शैलेन्द्र ने अपने पिता के असामयिक निधन के बाद उनके अधूरे सेवा कार्यों को जीवित रखने के लिए जो त्याग किया है, उसने उन्हें आज के युवाओं के लिए एक प्रेरणास्रोत बना दिया है।*

*जब पिता का ‘संकल्प’ बन गया बेटे का ’जीवन’*

*वरिष्ठ पत्रकार स्व. मनोहरलाल कुमावत जीवनभर समाज सेवा और परमार्थ के कार्यों में जुटे रहे। जब दिल का दौरा पड़ने से उनका अचानक साया सिर से उठा, तो परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। अमूमन ऐसी घड़ी में लोग अपने करियर और नौकरी की चिंता में डूब जाते हैं, लेकिन शैलेन्द्र ने एक अलग और कठिन रास्ता चुना। उन्होंने अपने पिता के अधूरे सामाजिक और सेवा कार्यों को आगे बढ़ाने के लिए परिवार के सहयोग से ‘‘आजीवन नौकरी न करने’’ का एक कठोर संकल्प ले लिया। उन्होंने अपने व्यक्तिगत करियर को तिलांजलि दे दी ताकि वे अपने पिता के छोड़े हुए सेवा पथ पर निरंतर चल सकें।*

*समाज के कड़वे सच पर करारा प्रहार*

*आज समाज में संस्कारों का जो ह्रास हो रहा है, आजकल हम आए दिन देखते हैं कि पढ़-लिखकर बड़े पदों पर पहुंचे बच्चे अपने बूढ़े माता-पिता को सड़कों पर लावारिस छोड़ देते हैं या वृद्धाश्रमों में भेज देते हैं। हद तो तब हो जाती है जब वे उनके अंतिम समय में मुखाग्नि देने भी नहीं आते, लेकिन दफ्तरों से क्लेम लेने के लिए मृत्यु प्रमाण पत्र (डेथ सर्टिफिकेट) सबसे पहले मांगते हैं। इस संस्कारहीनता को बदलना ही मेरे जीवन का ध्येय है।*

*बच्चों में ‘‘सेवा के बीजारोपण’’ का अनूठा प्रयास*

*शैलेन्द्र का यह त्याग सिर्फ भावुकता नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति में पिता के सर्वोच्च स्थान को पुनः स्थापित करने की एक वैचारिक सोच है। वे आने वाली पीढ़ी को यह सिखाना चाहते हैं कि पिता सिर्फ संपत्ति वसीयत में छोड़कर जाने वाला माध्यम नहीं है, बल्कि वह ज्ञान का अमूल्य भंडार, संयम, धीरज, गंभीरता और अनुशासन का साक्षात स्वरूप है। शैलेन्द्र आज के बच्चों और युवाओं में माता-पिता की सेवा के संस्कार का बीजारोपण कर रहे हैं, ताकि भविष्य में किसी भी बुजुर्ग को वृद्धाश्रम का मुंह न देखना पड़े।*

*निष्कर्ष पिता के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि*

*फादर्स डे पर जहां लोग सोशल मीडिया पर तस्वीरें पोस्ट कर औपचारिकताएं पूरी कर रहे हैं, वहीं उज्जैन के शैलेंद्र कुमावत ने परिवार में माता संगीता कुमावत के आर्शीवाद एवं छोटे भाई जितेन्द्र के आजीवन सहयोग से अपनी पूरी जिंदगी अपने पिता के आदर्शों के नाम कर दी है। पिता के प्रति ऐसा समर्पण और आजीवन सेवा का यह संकल्प ही वास्तव में ‘‘फादर्स डे’’ को सार्थक बनाता है। शैलेन्द्र कुमावत का यह कदम आज के आधुनिक समाज की आंखें खोलने और भटके हुए युवाओं को सही राह दिखाने के लिए एक जलती हुई मशाल के समान है।*