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रावण दहन पर एक चिंतन

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उज्जैन / पिछले दो-तीन वर्षों से रावण दहन को लेकर सोशल मीडिया के प्लेटफार्म पर तर्क वितर्क शुरू हुए थे। ब्राह्मण समाज की मनसा अनुरूप रावण ब्राह्मण वंश से तालुकात रखते हैं और वेद पाठी शास्त्रों के ज्ञाता भगवान शिव के भक्त है। ऐसे में बुराई का प्रतीक बता कर उनका पुतला दहन करना ब्रह्म गौरव का अपमान है। इस बार इस मुद्दे को लेकर न्यायपालिका के समक्ष पहुंचने की तैयारी के अंतर्गत शहर में रावण दहन करने वाली आयोजक समितियां को लीगल नोटिस दिए गए हैं और रावण दहन के कार्यक्रम को बंद करने के लिए सूचना दी गई है। आपत्ति करता पक्ष का कहना है कि शास्त्र में कहीं भी रावण दहन का कोई उल्लेख नहीं है तो फिर रावण दहन के आयोजन क्यों…? आपत्ती कर्ताओं के तर्क में कुछ हद तक सच्चाई भी है रावण का दहन शास्त्र या अति प्राचीन परंपरा के रूप में नहीं है। रावण विद्वान इसको स्वीकार करने में भी किसी को आपत्ति नहीं होना चाहिए प्रभु श्री राम ने भी रावण के अंतिम समय में अपने अनुज लक्ष्मण को रावण से ज्ञान का भंडार प्राप्त करने के लिए प्रेरित किया था। यह सब शास्त्र हमें बताते हैं। अब सवाल यह उठता है कि फिर रावण का दहन क्यों..? इसके पीछे का तर्क जानने के लिए हमने उज्जैन के विद्वान ज्योतिषाचार्य और सोशल मीडिया के माध्यम से सदैव सनातन धर्म के लिए पक्ष रखने वाले गुरु श्री पंडित कुशल भट्ट जी से एक आलेख प्राप्त हुआ जो की आप पाठ को के समक्ष रखना तर्कसंगत होगा।

रावण दहन की परंपरा कोई अति प्राचीन या सनातन काल की नही। चुकी बच्चो को रावण राम के चरित्र से अवगत करवाने की का एक प्रयास के रूप में चालू हुआ। इसी क्रम में अंकपात पर मिट्टी का कुंभकर्ण बनाया जाता था और उस पे पत्थर फेंके जाते थे कई घायल भी हो जाते धीरे धीरे उसकी जगह पुतला खड़ा होने लगा फिर दत्त अखाड़ा शास्त्री नगर आदि कालोनी में प्रचलन चल पड़ा भीड़ आकर्षित के लिए कई प्रयोग हुए। पुराने लोग की सहमति से महाकाल बाबा की सवारी दशहरा मैदान जाने लगी चुकी भारतीय सभ्यता उत्सव प्रिय है और ऐसे आयोजन होते रहने में दर्ज नही ये रावण प्रेम हमारी मान्यताओं पर विवाद के लिए कुछ बुद्धिजीवियों की उपज हो सकती रावण की अच्छाई उसकी एक बुराई पर कालिख पोत गई कुछ विद्वान उसको संयमी साबित करने लगे कि उसने सीता के साथ जोर जबरजस्ती नही की बड़ा संयमी था जब उसको एक स्त्री का श्राप था कि यदि किसी स्त्री को उसकी इच्छा के विरुद्ध छू एगा तो सर के टुकड़े हो जायेगे इसलिए डर से संयमी बना रहा कोई उसको बहन के अपमान से जोड़ कर बताते जब कि सूर्पनखा ने कामातुर हो कर राम लक्ष्मण से प्रणय निवेदन किया बात नही बनी तो सीता को मारने का प्रयास किया और नाक कटवाई लंका जा कर अपने लम्पट भाई के सामने राम लक्ष्मण से ज्यादा सीता के सौंदर्य का वर्णन किया क्योकि वो राक्षसराज की मनोवृत्ति जानती थी और उसमे वो सफल हुई,, जो अपनी कामपिपासा के लिए पुत्र पौत्र भाई मित्र नाते रिश्तेदार को दांव पर लगा दे उसके लिए समर्थन मुझे उचित नही।लगता। वैसे देश के कई हिस्सों में रावण की पूजन भी होती है। ग्रेटर नोयडा में बिसरख कांगड़ा। कानपुर विदिशा मंदसौर आदि कई जगह अपने पास में ग्राम चिकली में कही उसको विद्वान ब्राह्मण कहि दामाद कही शिव भक्त मान कर मतमतान्तर है पहले किसी ने न दहन पर ओर न पूजन पर विवाद किया पर आजकल सोशल मीडिया आ गया 24×7चेनल आ गए उस पर दिखने दिखाने की लालसा ने कई विवाद पैदा कर के टाइम पास 😢 कर्नाटक के कोलार में फसल आने पर लंकेश्वर उत्सव मनाया जाता है और रावण की सवारी निकाली जाती है हरि अनन्त कथा अनन्ता प्रभु के अवतार हुए उसी तरह राक्षसों के भी कई अवतार हुए। सनकादि ऋषि के श्राप से जय विजय द्वारपाल राक्षस के रूप सतयुग में हिरङ्क्षयपु हिरण्याक्ष त्रेता में रावण कुंभकर्ण। द्वापर में कंस चाणूर के रूप में जन्मे खूब आतंक मचाया ताकि प्रभु जल्द अवतार ले और उनका उद्धार करे

रावण दहन की परंपरा आजादी के बाद सर्व प्रथम 1948 में रांची में चालू हुई कुछ शरणार्थी ने रावण का पुतला बना कर दहन किया उसमे पुतले का मुख गधे का बनाया जाता था दिल्लीमें पहली बार दिनांक ,17 ओक्टुबर1953 में दहन हुआ 1955 में पटना में पहले दशहरे पर रामलीला का मंचन ही होता रहा रावण दहन का नही फिर लोकरीति में चल पड़ा