भौगोलिक दृष्टिकोण, आधुनिक मानचित्रण एवं जीआईएस तकनीक से प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर प्रबंधन पर दिया जोर
उज्जैन/ प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस, शासकीय माधव महाविद्यालय, उज्जैन के भूगोल विभाग एवं प्रकृति शोध सोसाइटी, उदयपुर (राजस्थान) के संयुक्त तत्वावधान उच्च शिक्षा विभाग मध्य प्रदेश शासन द्वारा प्रायोजित द्वितीय अंतरराष्ट्रीय प्रकृति कॉन्फ्रेंस का समापन समारोह उत्साहपूर्ण एवं गरिमामय वातावरण में संपन्न हुआ। द्वितीय दिवस चार तकनीकी सत्रों का हाइब्रिड वर्चुअल मोड़ पर आयोजित कर इसमें प्रतिभागियों द्वारा उच्च स्तरीय शोध पत्र प्रस्तुत किये गये।
कार्यक्रम का शुभारंभ माँ सरस्वती की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्वलित कर भारतीय पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुरूप किया गया। द्वितीय अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति सम्मेलन (II IPCU-2026) के समापन समारोह में कार्यक्रम के अध्यक्ष एवं संयोजक डॉ. मोहन निमोले द्वारा मंचासीन अतिथियों का शॉल एवं स्मृति-चिह्न भेंट कर आत्मीय स्वागत एवं सम्मान किया गया। अपने उद्बोधन में डॉ. निमोले ने बताया कि दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति सम्मेलन में देश-विदेश के 200 से अधिक प्रतिभागियों, शिक्षाविदों, विषय-विशेषज्ञों एवं शोधार्थियों सहित 100 से अधिक पी.जी. के विद्यार्थियों ने सहभागिता कर इसे सफल एवं सार्थक बनाया। प्राचार्य प्रो. कल्पना वीरेंद्र सिंह ने स्वागत उद्बोधन देते हुए सतत विकास, पर्यावरण संरक्षण तथा संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों की प्रासंगिकता पर विस्तार से प्रकाश डाला। आपने बताया कि महाविद्यालय का भूगोल विभाग क्लाइमेट एक्शन, वसुधा फ्लैगशिप अंतर्गत निरंतर कार्य कर रहे हैं। प्रो. डी. डी. बेदिया मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। अपने उद्बोधन में उन्होंने पर्यावरणीय क्षरण के लिए मानवीय गतिविधियों को प्रमुख रूप से उत्तरदायी बताया। उन्होंने उज्जैन की जल समस्या का उल्लेख करते हुए कहा कि जल संकट के लिए कहीं न कहीं हम स्वयं भी जिम्मेदार हैं। यदि हम प्रकृति के संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग नहीं करेंगे, तो पर्यावरणीय असंतुलन की समस्या और गंभीर होती जाएगी। समापन समारोह के मुख्य अतिथि प्रो. डी.डी. बेदिया कुलगुरु, बरकतुल्लाह विश्वविद्यालय, भोपाल ने भारतीय संस्कृति एवं रामायण की चौपाइयों के संदर्भ में पंचमहाभूत—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश के संतुलन के महत्त्व को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि यदि प्रकृति के पाँच तत्वों में से एक भी असंतुलित हो जाता है, तो समग्र प्राकृतिक संतुलन को पुनः स्थापित करना कठिन हो जाता है। भारतीय संस्कृति में प्रकृति को पूजनीय मानने की परंपरा हमारी पर्यावरण संरक्षण संबंधी वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक चेतना को प्रदर्शित करती है। उन्होंने भूमि के विवेकपूर्ण उपयोग पर जोर देते हुए कहा कि विकास कार्यों के लिए ऐसी भूमि को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, जो अनुपयोगी अथवा लंबे समय से खाली पड़ी हो, ताकि उपजाऊ कृषि भूमि एवं प्राकृतिक संसाधनों पर अनावश्यक दबाव न पड़े।
प्रकृति शोध संस्थान, उदयपुर के संस्थापक एवं अध्यक्ष प्रो. पी. आर. व्यास ने अपने उद्बोधन में कॉन्फ्रेंस की उपलब्धियों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण, उनका विवेकपूर्ण उपयोग तथा पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखना वर्तमान समय की प्रमुख आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि सतत विकास के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण, भौगोलिक अध्ययन, अनुसंधान और स्थानीय ज्ञान को साथ लेकर चलना होगा। विभिन्न राज्यों से आए भूगोलवेत्ताओं, पर्यावरणविदों, प्राध्यापकों, शोधार्थियों तथा प्रतिभागियों की सक्रिय सहभागिता को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि ऐसे अकादमिक आयोजन प्रकृति संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाने के साथ-साथ नए शोध एवं नवाचार की संभावनाओं को भी प्रोत्साहित करते हैं। अंत में उन्होंने सम्मेलन के सफल आयोजन में सहयोग देने वाले महाविद्यालय के प्राचार्य, आयोजन समिति, विभिन्न सत्रों के संयोजकों, शोधपत्र प्रस्तुतकर्ताओं एवं सभी सहयोगियों के प्रति आभार व्यक्त किया तथा भविष्य में भी प्रकृति संरक्षण और सतत विकास के क्षेत्र में सामूहिक प्रयास जारी रखने का आह्वान किया। प्रो. पी. आर. व्यास को मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़ क्षेत्र कार्यालय उज्जैन की ओर से प्रकृति अवार्ड से सम्मानित किया गया।
समापन समारोह की वैलेडिक्टरी अतिथि प्रो. अंजना व्यास अहमदाबाद ने बौद्धिक गरिमा प्रदान की, उन्होंने प्रकृति संरक्षण, सतत संसाधन प्रबंधन और पारिस्थितिकी संतुलन को भविष्य की विकास यात्रा का आधार बताते हुए शोध, नवाचार एवं सामूहिक सहभागिता की आवश्यकता पर बल दिया। उनका उद्बोधन प्रकृति और मानव के सह-अस्तित्व तथा विकसित भारत 2047 की संकल्पना को साकार करने की दिशा में प्रेरणादायी रहा।
प्रो. बी.पी. नैथानी ने अपने उद्बोधन में प्रकृति संरक्षण, प्राकृतिक संसाधनों के सतत प्रबंधन तथा पर्यावरणीय संतुलन के महत्व पर प्रकाश डाला। आपके संयोजन में तृतीय अंतरराष्ट्रीय प्रकृति कार्यशाला के आयोजन की घोषणा की गई आगामी कॉन्फ्रेंस हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय, श्रीनगर गढ़वाल के भूगोल विभाग द्वारा आयोजित होगी। इससे हिमालयी पर्यावरण, प्राकृतिक संसाधनों, पारिस्थितिकीय चुनौतियों और सतत विकास से जुड़े विषयों पर राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अकादमिक संवाद तथा शोध सहयोग को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
आयोजक सचिव डॉ. प्रमिला बघेल के द्वारा सम्मेलन में दिए गए विवरण को औपचारिक सुव्यवस्थित और प्रभावशाली सम्मेलन प्रतिवेदन एवं रिपोर्ट प्रस्तुत किया गया। आठ तकनीकी सत्रों का संयोजक प्रो. प्रभाकर मिश्र ने के द्वारा किया गया। प्रो. पी.आर. व्यास के द्वारा यंग साइंटिस्ट की नींव रखी, कॉन्फ्रेंस के दौरान शोध छात्र आशीष कुमार को यंग साइंटिस्ट अवार्ड से सम्मानित कर 5100 सौ रुपए का नगद पुरस्कार प्रदान किया गया। कॉन्फ्रेंस के दौरान विभिन्न श्रेणियों में उत्कृष्ट शोध एवं अकादमिक योगदान के लिए प्रतिभागियों को प्रकृति अवार्ड से सम्मानित किया गया। इस आयोजन ने विभिन्न राज्यों और देशों के विद्वानों को अपने शोध अनुभव साझा करने तथा प्रकृति संरक्षण से जुड़े नए विचारों पर संवाद करने का अवसर प्रदान किया।
महाविद्यालय के पूर्व प्राचार्य एवं प्राध्यापक प्रो.जे.एल. बारमैया, भूगोल विभाग के पूर्व विभागध्यक्ष प्रो.आर. आर. गोरसिया, प्रो. रवि मिश्रा, डॉ. आर.के. श्रीवास्तव, प्रो. बी.एल. पाटीदार. प्रो. केशवमणि शर्मा प्रो. अल्पना दुभासे, डॉ. कृपाराम, डॉ. दयानंद (मुंबई), प्रो. प्रकाश मिश्रा, प्रो. डी. पी. सिंह, डॉ. अनिता नैथानी तथा डॉ. सुमिता पंवार सहित अनेक शिक्षाविदों एवं विशेषज्ञों की उपस्थिति रही। कार्यक्रम का संचालन डॉ. ममता पवार और डॉ. रफीक नागौरी के द्वारा किया गया। अंत में आभार प्रदर्शन कार्यशाला के सह-संयोजक डॉ. गणेश राठौड़ द्वारा व्यक्त किया गया।













